My stint with writing started in 8th grade and always remained amateurish, school-kid type because I feel full stomach and contentment with surrounding doesn't bring out poetry never of the type that can provoke someone's thoughts and touch their heart.
One of my serious attempts with poetry was instigated by one such incident which also is and will remain one of the greatest sorrows of my life - the great human tragedy of 2002 Godhara carnage and the aftermath of riots. As always in such kind of communal clashes, humanity more than the humans was victim. This taandav of death everywhere, made me question, if God really exists and so the poem.
आत्मचिंतन
जब शाम ये ढलने लगती है,
दिल मे एक मायूसी छाने लगती है |
ये शाम ना आएगी वापस फिर से,
ये बात बहोत तड़पाने लगती है |
कभी कभी लगता है ,
जैसे ज़िंदगी बुझने को है |
अल्पविरामों से घिरी इस पर,
पूर्णविराम लगने को है |
फिर कभी लगता है ऐसा,
अंतहीन है ये जीवन तो |
कूछ चंद मंज़र भले ही बीत गये हों,
पर युग के उस पार है , इसकी मंज़िल तो |
अक्सर दिल मे,
एक बात बहोत ही चुभती है |
क्या ये सच है कि,
ज़िंदगी केवल चंद पलों के लिए रुकती है?
क्या सच-मुच है,
अस्तित्व आत्मा का?
क्या सच-मुच आत्मा है,
रूप परमात्मा का?
कौन है ये परमात्मा,
जो कभी दिखाई नही देता?
आख़िर क्यूँ वो मंदिर-मस्जिद मे रहता है,
हमारे तुम्हारे दिलों मे नहीं रहता?
हिंदू कहता है,
वो मंदिरों मे रहता है |
मुस्लिम कहता है,
वो मस्जिदों मे रहता है|
ईसाई के लिए गिरज़ाघर और
सिखों के लिए गुरुद्वारा उसका स्थान है |
आख़िर क्यूँ इन सब के मन में,
केवल अपने देवो के लिए सम्मान है?
ये बुद्धिजीवी मनुष्य ये क्यूँ नही समझता,
कि राम, रहीम, ईसा और कृष्ण,
एक दूसरे के छद्म रूप हैं |
आत्मा तो स्वयं परमात्मा का
जीता जागता स्वरूप है |
जब ये सब एक ही मिट्टी से बने,
अलग-अलग आकार हैं |
तो हम भी तो इन सब से बन कर ही,
वास्तव मे साकार हैं |

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