Wednesday, March 30, 2011
My poem - AatmaChintan
Tuesday, May 11, 2010
Rashmirathi by Ramdhari Singh "Dinkar"
सह धूप घाम पानी पत्थर
पांडव आए कूछ और निखर
सौभाग्य ना सब दिन सोता है
देखें आगे क्या होता हे |
मैत्री की राह दिखाने को
सब को सुमार्ग पर लाने को
दुर्योधन को समझाने को
भीषण विध्वंस बचाने को
भगवान हस्तिनापुर आए
पांडव का संदेशा लाए |
दो न्याय अगर तो आधा दो
पर इसमे भी यदि बाधा हो
तो दे दो केवल पाँच ग्राम
रखो अपनी धरती तमाम
हम वही खुशी से खाएँगे
परिजन पे असी ना उठाएँगे | (असी = हथियार)
दुर्योधन वो भी दे ना सका
आशीष समाज की ले ना सका
उल्टे हरी को बाँधने चला
जो था असाध्य साधने चला
जब नाश मनुज पर छाता है
पहले विवेक मर जाता है |
हरी ने भीषण हुंकार किया
अपना स्वरूप विस्तार किया
डगमग डगमग दिग्गज डोले
भगवान कुपित होकर बोले
जंजीर बढ़ा अब साध मुझे
हाँ हाँ दुर्योधन बाँध मुझे |
यह देख गगन मुझमे लय है
यह देख पवन मुझमे लय है
मुझमे विलीन झंकार सकल
मुझमे लय है संसार सकल
अमरत्व फूलता है मुझमे
संहार झूलता है मुझमे |
उदयाचल मेरे दीप्त भाल
भू-मंडल वक्ष-स्थल विशाल
भुज परिधि बाँध को घेरे हैं
मैनाक मेरु पग मेरे हैं
दिप्ते जो ग्रह नक्षत्र निकर
सब हैं मेरे मुख के अंदर |
दृग हो तो दृश्य अखंड देख
मुझमे सारा ब्रह्मांड देख
चर-अचर जीव, जग क्षर अक्षर
नश्वर मनुष्य, सूरजति अमर
सत कोटि सूर्या, सत कोटि चंद्र
सत कोटि सरित सर सिंधु मंद्र |
सत कोटि ब्रह्मा विष्णु महेश
सत कोटि जलपति जीश्णु धनेश
सत कोटि रुद्र, सत कोटि काल
सत कोटि दंड धर लोकपाल
जंजीर बढ़ा कर साध इन्हें
हाँ हाँ दुर्योधन बाँध इन्हें |
भूतल अटल पाताल देख
गत और अन्गत काल देख
यह देख जगत का आदि सृजन
यह देख महाभारत का रण
मृतको से पॅटी हुई भू है
पहचान कहाँ इसमें तू है?
अम्बर का कुन्तल जाल देख
पद के नीचे पाताल देख
मुट्ठी में तीनो काल देख
मेरा स्वरूप विकराल देख
सब जन्म मुझी से पाते हैं
फिर लौट मुझी में आते हैं |
जिहवा से कढती ज्वाल सघन
सांसो से पाता जन्म पवन
पर जाती मेरी दृष्टि जिधर
हँसने लगती है सृष्टि उधर
मैं जब भी मूंदता हूँ लोचन
छा जाता चारो ओर मरण |
बाँधने मुझे तू आया है
जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन
पहले तू बाँध अनंत गगन
सुने को साध ना सकता है
वो मुझे बाँध कब सकता है?
हित वचन नहीं तूने माना
मैत्री का मूल्य ना पहचाना
तो ले अब मैं भी जाता हूँ
अंतिम संकल्प सुनाता हूँ
याचना नही अब रंण होगा
जीवन जय या कि मरण होगा |
टकराएँगे नक्षत्र निखर
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर
फन शेषनाग का डोलेगा
विकराल काल मुँह खोलेगा
दुर्योधन रंण ऐसा होगा
फिर कभी नही जैसा होगा |
भाई पर भाई टूटेंगे
विष-बांन बूँद-से छूटेंगे
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे
वायस श्रगाल सुख लूटेंगे
आख़िर तू भूषयी होगा
हिंसा का पर्दायी होगा |
थी सभा सन्न, सब लोग डरे
चुप थे या थे बेहोश पड़े
केवल दो नर ना अघाते थे
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे
कर जोड़ खरे प्रमुदित निर्भय
दोनो पुकारते थे जय-जय |
Monday, April 26, 2010
A nice poem from the movie "Sehar"
This poem is a part of one of my favorite Hindi movie "Sehar". Based on the Hindu belief of human ,made up of five elements i.e. Fire, earth, air, water and sky, the poem is an individual's testimony of his humble acceptance of almighty's great powers and the ultimate reality of death.
इस काली ठंडी आग को वापस कर रहा हूँ मैं…..
और इसीके साथ लौटा रहा हूँ, ये सफेद मिट्टी, ये गतिहीन पानी , ये बहरी हवा
और ये अथाह आकाश, जो गूंगा है…..|
यूँ तो मैं जानता हूँ ईश्वर, की तुम जानते थे की एक दिन,
मैं ये सब कुछ इसी तरह तुम्हें वापस कर दूँगा |
Iss kali thandi aag ko vapas kar raha hoon main…..
Aur isike sath lauta raha hoon, ye safed mitti, ye gatiheen pani , ye bahari hawaa
aur ye athah akash, jo gunga hai…..
Yoon to main janta hoon ishawar, ki tum jante the ki ek din,
main ye sab kuchh issi tarah tumhe vapas kar dunga….
