I had forgotten this poem for some times but got reminded from the hindi movie "Gulaal" where the brother (played by Piyush Mishra) of Duki baana (played by KK) challenges him after being insulted.
The poem also is a symbol of glorious days of Hindi poetry during pre-independence era. With current day hindi poetry, limiting to Love shayaris and Hasya-kavita (funny poetries), we see a dearth of quality hindi poems (or it's just that my reading in Hindi poetry is less) like this.
Anyway enjoy this poem .....
वर्षो तक वन मे घूम-घूम
बाधा विघ्नों को चूम-चूम
सह धूप घाम पानी पत्थर
पांडव आए कूछ और निखर
सौभाग्य ना सब दिन सोता है
देखें आगे क्या होता हे |
मैत्री की राह दिखाने को
सब को सुमार्ग पर लाने को
दुर्योधन को समझाने को
भीषण विध्वंस बचाने को
भगवान हस्तिनापुर आए
पांडव का संदेशा लाए |
दो न्याय अगर तो आधा दो
पर इसमे भी यदि बाधा हो
तो दे दो केवल पाँच ग्राम
रखो अपनी धरती तमाम
हम वही खुशी से खाएँगे
परिजन पे असी ना उठाएँगे | (असी = हथियार)
दुर्योधन वो भी दे ना सका
आशीष समाज की ले ना सका
उल्टे हरी को बाँधने चला
जो था असाध्य साधने चला
जब नाश मनुज पर छाता है
पहले विवेक मर जाता है |
हरी ने भीषण हुंकार किया
अपना स्वरूप विस्तार किया
डगमग डगमग दिग्गज डोले
भगवान कुपित होकर बोले
जंजीर बढ़ा अब साध मुझे
हाँ हाँ दुर्योधन बाँध मुझे |
यह देख गगन मुझमे लय है
यह देख पवन मुझमे लय है
मुझमे विलीन झंकार सकल
मुझमे लय है संसार सकल
अमरत्व फूलता है मुझमे
संहार झूलता है मुझमे |
उदयाचल मेरे दीप्त भाल
भू-मंडल वक्ष-स्थल विशाल
भुज परिधि बाँध को घेरे हैं
मैनाक मेरु पग मेरे हैं
दिप्ते जो ग्रह नक्षत्र निकर
सब हैं मेरे मुख के अंदर |
दृग हो तो दृश्य अखंड देख
मुझमे सारा ब्रह्मांड देख
चर-अचर जीव, जग क्षर अक्षर
नश्वर मनुष्य, सूरजति अमर
सत कोटि सूर्या, सत कोटि चंद्र
सत कोटि सरित सर सिंधु मंद्र |
सत कोटि ब्रह्मा विष्णु महेश
सत कोटि जलपति जीश्णु धनेश
सत कोटि रुद्र, सत कोटि काल
सत कोटि दंड धर लोकपाल
जंजीर बढ़ा कर साध इन्हें
हाँ हाँ दुर्योधन बाँध इन्हें |
भूतल अटल पाताल देख
गत और अन्गत काल देख
यह देख जगत का आदि सृजन
यह देख महाभारत का रण
मृतको से पॅटी हुई भू है
पहचान कहाँ इसमें तू है?
अम्बर का कुन्तल जाल देख
पद के नीचे पाताल देख
मुट्ठी में तीनो काल देख
मेरा स्वरूप विकराल देख
सब जन्म मुझी से पाते हैं
फिर लौट मुझी में आते हैं |
जिहवा से कढती ज्वाल सघन
सांसो से पाता जन्म पवन
पर जाती मेरी दृष्टि जिधर
हँसने लगती है सृष्टि उधर
मैं जब भी मूंदता हूँ लोचन
छा जाता चारो ओर मरण |
बाँधने मुझे तू आया है
जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन
पहले तू बाँध अनंत गगन
सुने को साध ना सकता है
वो मुझे बाँध कब सकता है?
हित वचन नहीं तूने माना
मैत्री का मूल्य ना पहचाना
तो ले अब मैं भी जाता हूँ
अंतिम संकल्प सुनाता हूँ
याचना नही अब रंण होगा
जीवन जय या कि मरण होगा |
टकराएँगे नक्षत्र निखर
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर
फन शेषनाग का डोलेगा
विकराल काल मुँह खोलेगा
दुर्योधन रंण ऐसा होगा
फिर कभी नही जैसा होगा |
भाई पर भाई टूटेंगे
विष-बांन बूँद-से छूटेंगे
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे
वायस श्रगाल सुख लूटेंगे
आख़िर तू भूषयी होगा
हिंसा का पर्दायी होगा |
थी सभा सन्न, सब लोग डरे
चुप थे या थे बेहोश पड़े
केवल दो नर ना अघाते थे
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे
कर जोड़ खरे प्रमुदित निर्भय
दोनो पुकारते थे जय-जय |
सह धूप घाम पानी पत्थर
पांडव आए कूछ और निखर
सौभाग्य ना सब दिन सोता है
देखें आगे क्या होता हे |
मैत्री की राह दिखाने को
सब को सुमार्ग पर लाने को
दुर्योधन को समझाने को
भीषण विध्वंस बचाने को
भगवान हस्तिनापुर आए
पांडव का संदेशा लाए |
दो न्याय अगर तो आधा दो
पर इसमे भी यदि बाधा हो
तो दे दो केवल पाँच ग्राम
रखो अपनी धरती तमाम
हम वही खुशी से खाएँगे
परिजन पे असी ना उठाएँगे | (असी = हथियार)
दुर्योधन वो भी दे ना सका
आशीष समाज की ले ना सका
उल्टे हरी को बाँधने चला
जो था असाध्य साधने चला
जब नाश मनुज पर छाता है
पहले विवेक मर जाता है |
हरी ने भीषण हुंकार किया
अपना स्वरूप विस्तार किया
डगमग डगमग दिग्गज डोले
भगवान कुपित होकर बोले
जंजीर बढ़ा अब साध मुझे
हाँ हाँ दुर्योधन बाँध मुझे |
यह देख गगन मुझमे लय है
यह देख पवन मुझमे लय है
मुझमे विलीन झंकार सकल
मुझमे लय है संसार सकल
अमरत्व फूलता है मुझमे
संहार झूलता है मुझमे |
उदयाचल मेरे दीप्त भाल
भू-मंडल वक्ष-स्थल विशाल
भुज परिधि बाँध को घेरे हैं
मैनाक मेरु पग मेरे हैं
दिप्ते जो ग्रह नक्षत्र निकर
सब हैं मेरे मुख के अंदर |
दृग हो तो दृश्य अखंड देख
मुझमे सारा ब्रह्मांड देख
चर-अचर जीव, जग क्षर अक्षर
नश्वर मनुष्य, सूरजति अमर
सत कोटि सूर्या, सत कोटि चंद्र
सत कोटि सरित सर सिंधु मंद्र |
सत कोटि ब्रह्मा विष्णु महेश
सत कोटि जलपति जीश्णु धनेश
सत कोटि रुद्र, सत कोटि काल
सत कोटि दंड धर लोकपाल
जंजीर बढ़ा कर साध इन्हें
हाँ हाँ दुर्योधन बाँध इन्हें |
भूतल अटल पाताल देख
गत और अन्गत काल देख
यह देख जगत का आदि सृजन
यह देख महाभारत का रण
मृतको से पॅटी हुई भू है
पहचान कहाँ इसमें तू है?
अम्बर का कुन्तल जाल देख
पद के नीचे पाताल देख
मुट्ठी में तीनो काल देख
मेरा स्वरूप विकराल देख
सब जन्म मुझी से पाते हैं
फिर लौट मुझी में आते हैं |
जिहवा से कढती ज्वाल सघन
सांसो से पाता जन्म पवन
पर जाती मेरी दृष्टि जिधर
हँसने लगती है सृष्टि उधर
मैं जब भी मूंदता हूँ लोचन
छा जाता चारो ओर मरण |
बाँधने मुझे तू आया है
जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन
पहले तू बाँध अनंत गगन
सुने को साध ना सकता है
वो मुझे बाँध कब सकता है?
हित वचन नहीं तूने माना
मैत्री का मूल्य ना पहचाना
तो ले अब मैं भी जाता हूँ
अंतिम संकल्प सुनाता हूँ
याचना नही अब रंण होगा
जीवन जय या कि मरण होगा |
टकराएँगे नक्षत्र निखर
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर
फन शेषनाग का डोलेगा
विकराल काल मुँह खोलेगा
दुर्योधन रंण ऐसा होगा
फिर कभी नही जैसा होगा |
भाई पर भाई टूटेंगे
विष-बांन बूँद-से छूटेंगे
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे
वायस श्रगाल सुख लूटेंगे
आख़िर तू भूषयी होगा
हिंसा का पर्दायी होगा |
थी सभा सन्न, सब लोग डरे
चुप थे या थे बेहोश पड़े
केवल दो नर ना अघाते थे
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे
कर जोड़ खरे प्रमुदित निर्भय
दोनो पुकारते थे जय-जय |
